माँ


सच है माँ के कर्तव्य कभी ख़तम नहीं होते.. !




डा. अनुराग जी की पोस्ट यथार्थ का क्रास वेरिफिकेशन पढ़ते हुए एक बेहद अच्छी कविता याद आ गयी जो मैंने कभी कादम्बिनी में पढी थी और जिसे राहुल राजेश जी ने लिखा है.आज वही आप सभी के समक्ष रख रहा हूँ...!!!

माँ 
"जहाँ ठहर जाए 
वहीं घर..
जिसे छू ले 
वही तुलसी..
जिसे पुकार दे 
वही बेटा..
जब जागे 
तब बिहान..
जब पूजे 
तब नदी..
जब निरखे 
तब समुद्र.."

चित्र साभार :गूगल 

टिप्पणियाँ

अजय कुमार ने कहा…
सही है मां तो ऐसी ही होती है
ईश्वर का दूसरा रूप है माँ......
कुछ शब्द ......... लंबी, गहरी, मन से निकली, मन को छूते शब्दों से बुने कविता ............ मेरे पास शब्द नही हैं इस रचना के बारे में कहने के लिए ..........
शुक्रिया .........
मनोज कुमार ने कहा…
मां के प्रति समर्पित बहुत भावपूर्ण रचना।
रुला दिया....... बहुत सुंदर एहसास.......
Amrendra Nath Tripathi ने कहा…
जीवन का उत्स जन्मदात्री के पास से
सी मिल सकता है ..
सुन्दर कविता .. आभार ..
बेहतरीन प्रस्तुति गहरे भाव . मरते दम तक माँ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती रहती है ...सचमुच माँ महान है ...
Chandan Kumar Jha ने कहा…
कवित पढ़ मन निर्मल हो गया ।
बेहतरीन प्रस्तुति
सागर ने कहा…
wahan bhi padhi yaahan bhi ...
सुन्दर...श्रीश भाई...
माँ भगवान से पहले यही कह सकती हूँ आपकी रचना मे सभी भाव हैं चन्द शब्दों मे पूरी माँ बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है। अगर देखा जाये तो एक प्यारा सा एहसास है माँ जो हर बात मे हर क्षन मे और हर साँ स मे रहता है बधाई इस रचना के लिये आशीर्वाद भी
Himanshu Pandey ने कहा…
माँ-केन्द्रित महत्वपूर्ण कविता । कृपया यहाँ भी देखें ।
डॉ .अनुराग ने कहा…
अब जब के सारे रिश्तो को सेल्फ सेंटरड होते सामाज ने सोख लिया है ....ये रिश्ता अब भी ईमानदारी ओर उसी शिद्दत से अपने कर्त्तव्य निभाए जा रहा है......

"सोचता हूँ पूछूं माँ से एक एक दिन
कितना मुश्किल है आसान होना "
Abhishek Ojha ने कहा…
'माँ' एक शब्द जो जीवन में सबसे ज्यादा बार मुंह से निकला होगा. ये अकेला शब्द जितना सेंटी कर देता है उतना किसी और बात से होना संभव नहीं.
शरद कोकास ने कहा…
माँ पर लिखी कविता भी अच्छी ही होती है ।
Puja Upadhyay ने कहा…
आश्चर्य है मैंने भी ये कविता कहीं पढ़ी थी बहुत पहले, शायद कादम्बिनी में ही पढ़ी हो, आज फिर से पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. यहाँ से सहेज कर रख लूंगी. इस कविता के लिए धन्यवाद, चित्र भी बहुत मोहक है.
Unknown ने कहा…
धन्यवाद. बहुत शानदार अभिव्यक्ति है।
Arshia Ali ने कहा…
अदभुत कविता। कम शब्दों में इससे बेहतर भावाभिव्यक्ति नहीं हो सकती।
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ये तो बहुत ही आसान पहेली है?
धरती का हर बाशिंदा महफ़ूज़ रहे, खुशहाल रहे।
दर्पण साह ने कहा…
Rahul rajesh ji ki kavita ke uppar apni ek kavita yaad aa rahi hai shreesh bahi maaf karna lambi hai isliey comment bhi lamba ho jaiyega...


तूने भी तो,
जिया होगा
अपना बचपन...
अपना यौवन .

या जन्म से ही,
बन गयी थी तू 'माँ' ?

एक अलसाई रात,
तेरे आँचल में,
तब भी एक निरंतर रात्री.
जिसमें मेरे लिए,
केवल...
चाँद और रौशनी,

दुविधा तो तब भी थी,
तुझे,
जब किनारे में पड़ी,
मेरी पतंग,
संभाल के,
अपने दिल में रख लेती थी.

...क्या तू भी उडी थी माँ?


इन लकडियों में,
तेरे जड़ होने का,
आभास है,
जो तू ऊँचे नीच रास्तों पे,

ले जाती थी.

लकडियाँ गीली थी,
और उनके निचे,
तू जलती थी.

पर उसका धुआं,
मेरे आँख में,
न लगा कभी.


मेरी भूख,
और
तेरे जलने में,
...एक सम्बन्ध था,


तू भी तो,
कभी रही होगी


"गीली लकडी".

या अपने,
"कल्पना-वृक्ष" से,
झड़कर सदेव के लिए,
तूने ग्रहण किया एक,
शुष्क रूप?


मेरी प्रथम पाठशाला,
"अ" "आ"....
....तेरे कभी,
साम्यवाद,
महिला उद्धार,
या
"मांग की लोच" के विचार आये थे ?


तू तो मैं ही हूँ,
पर मैं कभी न बन सका ...
"तू"

क्या कभी,

कोई तू भी हुआ था?

मेरे हर पूजा का सार....
क्या कभी कोई तेरे लिए,
पूजनीय था?
इतना ही पूजनीय ?


दिन के खेल से थक के,
तेरे पसीने को
किसीने तो पोछा होगा न?

तेरे आँसू मेरे पास से,
होकर गुज़रते हैं,
और उनमें तू ,
सांस लेती है,

क्या कभी,
आंसुओं के होने का,
एहसास,
तेरी साँसों से भी हुआ था?

क्या तेरे जीवन को,
किसीने,
"बेतरतीब"
होने से बचाया था?

क्या तेरे भी न होने से,
अपने लिए कोई "भूख" ही पकाता था?

क्या तूने जिया है,
माँ के अलावा कोई जीवन?

Ab ja ke dil ko sukoon hai.
दर्पण साह ने कहा…
...jab phir se aap logon ko padhna shuru kiya.

(pichle comment se chooth gaya tha)
M VERMA ने कहा…
माँ तो माँ है और वह केवल मातृत्व ही बिखेरती है

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