ब्लॉग-जगत मे 'बात' : "बात की चूड़ी मर गई"

ब्लॉग-जगत मे 'बात' : "बात की चूड़ी मर गई"


हम ब्लागर हैं. हम विचार चुनते हैं, बहुधा सोचते हैं..और देर-सबेर उसे पोस्ट मे तब्दील करते हैं..टिप्पणियाँ आती हैं...लोग कहते हैं कि चर्चा शुरू हो गई. अब हम टिप्पणियाँ कर रहे हैं. प्रति टिप्पणियाँ कर रहे हैं..हम टिप्पणी शायद विषय पर कर रहे हैं...वस्तुपरक होकर कर रहे हैं...आ हा हा..ना ना व्यक्तिपरक होने लगे ...चर्चा गुम नई चर्चा शुरू...तो ठीक है कुछ भी हो हमे क्या टिप्पणियाँ तो बढ़ी रही हैं....तो फिर क्या हुआ कि वो बात खो गई जिस पर कुछ कहना था, वह विचार गुम हो गया जिसे हमने चुना था कि कोई सार्थक बहस होगी और लेखन का दायित्व (?) पूरा होगा...तो अब हमारी ब्लॉग-आर्काइव मे बस पोस्ट बचते  हैं , टिप्पणियाँ रह जाती हैं..बात-दर-बात, बात कुछ और ही बात मे तब्दील हो जाती है पर हमे क्या, हम तो दनादन लिखे जा रहे हैं...टिप्पणियों की सेंचुरी बनाते जा रहे हैं...वैसे भी यह हमारा ब्लॉग है..हमारी कलम है..दायित्व की चिंता से हमे क्या लेना-देना...हमे बात उठाना था...टिप्पणी पाना था...बात आगे बढ़े, बदल  जाये, कहीं और पहुँच जाये..तो क्या...अपनी बला से...!

पर, जनाब..!

क्या करूँ...ये कविता कुँवर नारायण जी की खटक रही है मन में.....

बात सीधी थी पर / कुंवर नारायण
कवि: कुंवर नारायण
~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~*~
बात सीधी थी पर एक बार
भाषा के चक्कर में
ज़रा टेढ़ी फँस गई ।

उसे पाने की कोशिश में
भाषा को उलटा पलटा
तोड़ा मरोड़ा
घुमाया फिराया
कि बात या तो बने
या फिर भाषा से बाहर आये-
लेकिन इससे भाषा के साथ साथ
बात और भी पेचीदा होती चली गई ।

सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना
मैं पेंच को खोलने के बजाय
उसे बेतरह कसता चला जा रहा था
क्यों कि इस करतब पर मुझे
साफ़ सुनायी दे रही थी
तमाशाबीनों की शाबाशी और वाह वाह ।

आख़िरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था –
ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी ।

हार कर मैंने उसे कील की तरह
उसी जगह ठोंक दिया ।
ऊपर से ठीकठाक
पर अन्दर से
न तो उसमें कसाव था
न ताक़त ।

बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछती देख कर पूछा –
“क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा ?”

                                                                                      (श्रीश और अमरेन्द्र आज शाम की बात में...)

टिप्पणियाँ

Arvind Mishra ने कहा…
क्या बात है श्रीश!/?
यह कविता खटक रही है मन में ! नहीं, अटक गयी है मन में !

मौजूँ कविता ।
अरे भईया! ये स्वागत-कथन तो देखा ही नहीं था -
"दिखता बहुत कुछ है, समझता कुछ-कुछ हूँ,सोचता सब कुछ हूँ...और लिखता इतना कुछ हूँ......"

स्वागत में ही हड़का दे रहे हैं ।
संगीता पुरी ने कहा…
बढिया रचना !!
महफूज़ अली ने कहा…
श्रीश.... .बात आगे बढ़े, बदल जाये, कहीं और पहुँच जाये..तो क्या...अपनी बला से...!

बहुत सही बात कही.....

कुँवर नारायण जी की कविता अच्छी लगी...... बहुत ही अच्छी पोस्ट.... सार्थक....
चूड़ी भले ही मर गई हो, लेकिन जब बात थोक ही ली है तो दूर तक जायेगी ! अच्छी कविता प्रस्तुति !
सागर ने कहा…
कमाल है श्रीश भाई... मेरे ख्याल को शब्द दे दिए... कवि का शुक्रिया साथ ही साथ आपका भी जो ....

ऐसा कई बार आता है पर ऐसा लिख नहीं सकता जनाब

देखिये तो कितनी सुन्दर कविता है... क्या विचार है... क्या बात है... वाह!
बहुत ही अच्छी लगी ये कविता....
अनूप शुक्ल ने कहा…
क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा ?

बड़ी सफ़ाई से अपनी बात कही। बहुत खूब!
आख़िरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था –
ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी
श्रीश जी सही बात खटक रही है आपके भी दिमाग मे । सभी जगह बहस बिना किसी नतीजे पर पहुँचे समाप्त हो जाती है। वैसे मुझे तो कोई मुद्द ही सही नहीं लगता बहस के लिये धर्म.नारीवाद आदि पर जी अधिक चर्चा होती है आज जरूरत है देशप्रेम पर भ्रश्टाचार पर और व्यवस्था पर बहस की। मगर असली मुद्दे तो पीछे चले गये हैं। कविता सही मे बहुत अच्छी है। धन्यवाद और आशीर्वाद्\
Apoorv ने कहा…
क्या बात है भाई श्रीश जी..बात की बात मे आपने बातों के ऐसे पेंच लड़ा दिये कि हमारी बातों की पतंग तो बिना-बात के ही कट गयी..ये भी कोई बात हुई भला..;-)
कुंवर नारायण जी के यह कविता पहली बार पढ़ने को मिली..उसके लिये आपका धन्यवाद..
बात की इसी बात पर कहीं प्रताप नारायण मिश्र जी ने भी बड़ी खूबसूरत बात कही थी एक निबंध के जरिये..हाईस्कूल मे पढ़ा था..
cmpershad ने कहा…
बात बेबात बन जाती है और टिप्पणी प्रतिटिप्पणी पर बात वहीं रह जाती है :)
हरकीरत ' हीर' ने कहा…
उसे पाने की कोशिश में

भाषा को उलटा पलटा

तोड़ा मरोड़ा

घुमाया फिराया

कि बात या तो बने

या फिर भाषा से बाहर आये-

लेकिन इससे भाषा के साथ साथ

बात और भी पेचीदा होती चली गई ।

कुछ ऐसे ही किस्से ब्लॉग जगत में भी हुए पिछले दिनों ....जितना जिसे मनाने की कोशिश की शब्दों के हेर फेर ने और दूरियां ला दीं....!!
किसी ब्लॉग की पंचलाइन कल परसों पढ़ी थी - अगर कुछ गले में अटका हो तो उगल देना चाहिये। ब्लॉग शायद विमर्श का माध्यम नहीं, उगालदान अधिक है!
बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछती देख कर पूछा –
“क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा ...

लगता है कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना था .......... पर कुंवर जी की रचना सही निशाने पर लगी है ....... आपका अंदाज़ बहुत भाया ........
वाणी गीत ने कहा…
विचार गुम हुए ....विचारणीय मुद्दे गौण रह गए ...समसामयिक प्रविष्टि ...!!
गिरिजेश राव ने कहा…
चूड़ी फेल हो फ्री हो जाय
तो
प्लम्बर को आवाज देना चाहिए।
वह हमारे भीतर ही रहता है।
शब्दों की बात 'ठुँकने' के लिए अभिशप्त है।
..कुछ लिखेंगे इस पर?
लेकिन लंठ उपाधि को वरण करना होगा।
शब्दश: नहीं व्यवहारत: - वैसे ही जैसे कॉलेज में पढ़ता कोई युवा होता है। ...
अच्छी बात है आपकी बात। और कुँवर नारायण जी की कविता के क्या कहने!!
आहा.. अतीव सुन्दर!

सामयिक..प्रासंगिक! 90% विमर्श अपने जीवन का चौथाई काल जी पायें, उससे पहले ही उनकी चूड़ी मर जाती है ब्लॉग जगत में..
दर्शन ने कहा…
लेखन का दायित्व (?)
Accha Prashn hai bhai...

अब हमारी ब्लॉग-आर्काइव मे बस पोस्ट बचते हैं, टिप्पणियाँ रह जाती हैं.

Wo muhavara yaad aa gaya....
"Haathi nigal gaye, poonch niglne main pareshaani ho rahi hai"

Pata nahi kyun, Aaj bhi samajh main nahi aaiya ki lekhak ko uski niji zindagi se hi kyun jaanna chahte hain kuch log? Ya fir har Pehchaan , Har mulaakat, aap kya karte hain ki bajaiye aap kaun hain se shuru hoti kyun hai?

Main is vishay main zayada bol paane ki stithi main nahi hoon kyunki,
is post ka 'SHIRSHAK' mujhe dara raha hai.


"उसे पाने की कोशिश में
भाषा को उलटा पलटा
तोड़ा मरोड़ा
घुमाया फिराया
कि बात या तो बने
या फिर भाषा से बाहर आये-
लेकिन इससे भाषा के साथ साथ
बात और भी पेचीदा होती चली गई ।"

Kyunki hum kitne hi bade kavi, lekhak ho jaiyen bahi, hum nahi anumaan laga sakte ki agal aadmi ise ki Prejudice se, kis mantavya se lega, Aisa kai baar hua hai,Kuch Likhne ka man hai:
Baat to,
Vastav Main,
Shabdon ke bandhan se pare hai.
Shabd to nimitt hain.
Haan par....
Prayojan?????


ek baar ek sher suna tha kahin....

Matlab jo samjhe mere sandesh ka,
Is desh main hai kya koi mere desh ka?
डॉ .अनुराग ने कहा…
बकोल धूमिल "कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है "......
लिखना दरअसल अपने आप को उलीचना है ....आप कैसे उलीचते है ..ओर क्या उलीचते है ये आप पर है ....मन्नू भंडारी ने एक बार कहा था ..के प्रशंसा से आप किसी को भी जीत सकते है ओर आलोचना से किसी को भी हार.....सच कहा था ...सबको रचनाकार बनना है ..पर हर रचनाकार पर व्यक्ति हावी हो जाता है ....जब आप ब्लॉग शुरू करते है हर प्रतिक्रिया पे उत्साहित होते है .धीरे धीरे आप उसे फ़िल्टर करने लगते है ...ओर खुद भी फ़िल्टर होने लगते है ........प्रतिक्रिया किसी भी लिखने वाले का खाका खीचती है ...एक बार जब खाका खींच जाता है ....फिर इनका गणित आपको उत्साहित नहीं करता....सोच ओर ख्याल आपको मोटिवेट करते है ....धीरे धीरे बुद्धिमान बने रहने में आपकी रूचि घटने लगती है ...शायद तब आप अपने आप को री- राईट करते है .....कुछ लोग इस प्रोसेस में महीने में पहुँचते है ...कुछ लोग सालो में ....
दर्शन ने कहा…
धीरे धीरे बुद्धिमान बने रहने में आपकी रूचि घटने लगती है ...शायद तब आप अपने आप को री- राईट करते है .....
(Calculated Risk !!!)

Behterin baat kahi hai bahi anurag sir ne. is baat ki kai baar apoorv se charcha kar chuka hoon, mujhe to mahino lage the apne baare main ye baat samjhne main...
...Par der aaiyad durust aaiyed.

Main phir kehta hoon agar main blogging main nahi aaiya hota to koop mandook hota. Khaskaar 'Contemporary Writing' ke paripekshya main.

Aur main pichle ek saal se apne ko re wirte na karne ki jugat main laga hua hoon.

Kishore sa'ab ka gaan yaad ho aaiya....
Ye laal rang... :(

Let's see....
S B Tamare ने कहा…
श्रीश जी ,

नया साल २०१० मुबारक हो !

साल दो हजार दस, खुशियों को कभी ना कहे अब और नहीं बस !

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कि;